मसीहा आयेगा, नीले आसमान से—- शायरी

मसीहा आयेगा, नीले आसमान से
ये यकीन हैं हमारा, दिलो जान से
मुबारक दुनिया को ये दुनियादारी
हम रहते जहाँ में, बस मेहमान से।

ढूंढी थी खुशियां बहुत इधर उधर
कहां मिलती हैं वो ऐसे सामान से
कभी तो समझोगे एक अरसे बाद
तबाह गुल खिले जहाँ के बागान से।

उलझाया अकसर, जहां के बाजार ने
कितने तड़पे हैं हम होकर बेईमान से
ये तो रहमत हैं मेरे मसीहा ए जहाँ की
वरना कौन बचाता हमें झूठे शैतान से।

कभी तो मिलेगी ही सुकून की भरपूरी
यूं कुछ जान ही चुके हैं अपने ईमान से
कब्र फाडी़ उसने तो फिर बचा क्या हैं
मौत भी हार चुकी है उसके फरमान से
रंजो गम तो है लेकिन कोई गम नहीं है
कौन जुदा करे हमें दिलों के अरमान से

मसीही शायरी- “मसीहा की मुहब्बत”

गुनाहों के अँधेरे की भी क्या बात थी
पर मसीहा के सामने क्या बिसात थी
मेरी ज़िंदगी तो थी वीरान वीरान सी
दिल में काले गम की अँधेरी रात थी
बस घेरे थे निराशाओं के बादल मुझे
यूँ हर तरफ बस दर्द की सौगात थी

मैंने ढूँढा ना उसको, वो ही खुद आया
ये उसकी रहमत और निराली बात थी
मैं अपनी ताकत से ढूंढ लूं क्या उसको
मुझ नाचीज की ये कहाँ से औकात थी

मसीहा मिले तो महसूस हुआ मुझे भी
जैसे हर ओर खुशियों की बरसात थी
मिट चुका था मेरा अकेलापन भी पूरा
अपनाने को विश्वासियों की जमात थी

उठते हैं हाथ उसकी इबादत में ही
वरना इन हाथों में तो खुराफात थी
बदलता है बस मसीहा का करिश्मा
वरना यूँ किसमें इतनी करामात थी