जातिवाद एवं धार्मिक पाखंडवाद पर प्रभू येशु मसीह का करारा प्रहार

जातिवाद और धार्मिक पाखंडवाद का जहर सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि यह एक समय इजरायल में भारत की तरह ही विद्यमान था। इस भयानक कैंसर पर प्रभू येशु मसीह ने 2000 साल पूर्व भयंकर कुठाराघात किया। सारी सृष्टि के मालिक ने मानव रुप धारण किया और मानव की वास्तविक समस्याओं को मिटाने का अद्भुत कार्य किया। पवित्र बाइबल हमें बताती हैं कि यहूदी लोग सामरी लोगों से छूआछूत करते थे (संत यूहन्ना अध्याय 4). आज जब तमाम तरह के कानून और पढ़ाई के बाद भी लोग जातिवाद में जकड़े है तो सोचिए कि २००० साल पहले परिस्थितियां कैसी रही होंगी! प्रभू येशु मसीह ने जातिवाद को मिटाने का जो नमूना पेश किया है वह इस प्रकार है—-

“सो वह सूखार नाम सामरिया के एक नगर तक आया, जो उस भूमि के पास है, जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था। और याकूब का कूआं भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कूएं पर यों ही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई। इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला।
क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गए थे।
उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते)। यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता” (संत यूहन्ना 4:5-10 http://www.bible2all.com).

यहां यह गौर करने लायक बात है कि यह स्त्री सामरी जाति की होने के कारण अचंभित थी कि एक यहूदी कैसे उससे पानी मांग सकता है (संत यूहन्ना 4). प्रभू येशु मसीह ने उस समय के समाज की सड़ांध मारती मानसिकता और घमंडी समाज के ठेकेदारों की परवाह न करते हुए एक सामरी स्त्री के हाथ से पानी पीना स्वीकार किया। इस कहानी में सबसे महत्वपूर्ण आध्यत्मिक पहलू हैं मगर मैं सिर्फ सामाजिक पहलू पर ही प्रकाश डालूंगा क्योंकि मेरे लेख का विषय वही हैं। प्रभू येशु मसीह ने जब इन जातिगत दीवारों को गिराया तो इसका परिणाम यह हुआ कि सामरियों ने उनको मसीहा (उद्धारकर्ता) के रूप में स्वीकार किया। आगे की कहानी इस प्रकार हैं-

“और उस नगर के बहुत सामरियों ने उस स्त्री के कहने से, जिस ने यह गवाही दी थी, कि उस ने सब कुछ जो मैं ने किया है, मुझे बता दिया, विश्वास किया। तब जब ये सामरी उसके पास आए, तो उस से बिनती करने लगे, कि हमारे यहां रह: सो वह वहां दो दिन तक रहा। और उसके वचन के कारण और भी बहुतेरों ने विश्वास किया। और उस स्त्री से कहा, अब हम तेरे कहने ही से विश्वास नहीं करते; क्योंकि हम ने आप ही सुन लिया, और जानते हैं कि यही सचमुच में जगत का उद्धारकर्ता है” (संत यूहन्ना 4:39-42 http://www.bible2all.com).

इस कहानी में हम देखते हैं कि न सिर्फ उन्होंने चलते चलते पानी पीया बल्कि दो दिन उनके घरों में उनके साथ रहे। प्रभू येशु मसीह की आध्यात्मिक क्रांति यहीं नहीं रुकी मगर बाद में प्रभू येशु मसीह के शिष्य फिलीप (यहूदी), प्रभू येशु मसीह के नक्शे कदम पर चलते हैं कहानी इस प्रकार बनती हैं-

“और फिलीप सामरिया नगर में जाकर लोगों में मसीह का प्रचार करने लगा। और जो बातें फिलीप ने कहीं उन्हें लोगों ने सुनकर और जो चिन्ह वह दिखाता था उन्हें देख देखकर, एक चित्त होकर मन लगाया -(प्रेरितों के काम 8:5-6 http://www.bible2all.com).

इस प्रकार हम देखते हैं कि यहूदियों और सामरियों के बीच की जातिगत दीवारें गिरने लगीं। जैसा कि लिखा है-“एक चित्त होकर मन लगाया” -(प्रेरितों के काम 8:5-6 http://www.bible2all.com). इसका सार यह निकलता है कि ईसाईयत के प्रभाव से मन के भेदभाव और मैल धुल गए। अब हम समझ सकते हैं कि यूरोप में क्रांति ऐसे ही नहीं आई है। काले गोरे के भेद ऐसे ही नहीं मिटे हैं। इजरायल महाशक्ति ऐसे ही नहीं बना है। मसीह की पावन ज्योति ने जातिवाद के अंधकार को मिटाया हैं। उसी दौर में प्रभू येशु मसीह के सेवक, संत पौलुस, जातिवाद को
मिटाने की शिक्षा पवित्र बाइबल में इस प्रकार देते हैं-

“क्योंकि तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो। और तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहिन लिया है। अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो। और यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो
-(गलातियों 3:26-29 http://www.bible2all.com).

अब धार्मिक पाखंडवाद पर प्रभू येशु मसीह के आक्रमण को देखते हैं-

“यहूदियों का फसह का पर्व निकट था और यीशु यरूशलेम को गया। और उस ने मन्दिर में बैल और भेड़ और कबूतर के बेचने वालों ओर सर्राफों को बैठे हुए पाया। और रस्सियों का कोड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिथरा दिए, और पीढ़ों को उलट दिया। और कबूतर बेचने वालों से कहा; इन्हें यहां से ले जाओ: मेरे पिता के भवन को व्यापार का घर मत बनाओ। तब उसके चेलों को स्मरण आया कि लिखा है, तेरे घर की धुन मुझे खा जाएगी” (यूहन्ना 2:13-17 http://www.bible2all.com).

मुझे यह कहने कि जरुरत नहीं है, बल्कि आप खुद समझ सकते हैं कि मंदिर में घुसकर, धर्म के नाम पर लूट मचा रहे धार्मिक पाखंडियों के धंधे पर हमला करना कितना खतरे से भरा कदम है। प्रभू येशु मसीह के इस कदम के कारण उनके शिष्यों में निर्भिकता का संचार हुआ और परिणामस्वरूप संत पीटर, स़ंत पौलुस और मार्टीन लूथर जैसे क्रांतिकारी हुए जिन्होंने प्रभू येशु मसीह की महिमा की तथा पाखंड पर करारा वार किया। प्रभू येशु मसीह की कृपा से ही यूरोपीय देशों और इजरायल से आडंबर का पर्दा हटने लगा और मानवता के लिए उम्मीद की किरण जागी।

क्या क्रिसमस मनाना जरूरी/उचित हैं?

इस विषय पर यह अतिमहत्वपूर्ण लेख लिखने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि भारत में तथा दुनिया के अन्य देशों में बहुत सारे ऐसे ईसाई हैं जो क्रिसमस मनाने का विरोध करते हैं। यह लोग न तो खुद क्रिसमस को आनंद मनाते हैं और न ही चाहते हैं कि कोई अन्य लोग आनंदित होने पाएं। इन में से कुछ क्रिसमस मनाने से इतने परेशान हैं कि क्रिसमस के दिन उपवास रख देते हैं।

दूसरी तरफ ईसाईयों के साथ साथ बहुत सारे हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिक्ख एवं अन्य धर्मों के लोग हैं जो क्रिसमस का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हमारे बहुत सारे गैर ईसाई मित्र भी उम्मीद करते हैं कि हम उन्हें क्रिसमस की पार्टी दें। वे बड़ी उत्सुकता से क्रिसमस का इंतजार करते हैं। अभी हम क्रिसमस त्यौहार को मनाने का विरोध करने वाले ईसाईयों के तर्कों और उनकी वैधता पर विचार करेंगे। साथ ही साथ शास्त्र सम्मत विचार प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। क्रिसमस विरोधी ईसाईयों के कुछ तर्क इस प्रकार है—-

1. येशु परमेश्वर है इसलिए वह अजन्मे हैं-

यह विचारधारा इस प्रकार है कि, ईश्वर सबकुछ का जन्मदाता है और उसका कोई सृष्टिकर्ता नहीं, इसलिए उसका जन्म संभव ही नहीं है। यह लोग तर्क देते हैं कि येशु प्रभु तो उनके जन्म से पहले अस्तित्व में थे (संत यूहन्ना 1). मानव स्वरुप से ज्यादा उनका ईश्वरीय स्वरुप महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव रूप में अवतरित होने से पहले इस पृथ्वी और उस लोक (स्वर्ग) पर उनका शासन चल रहा था। इस तरह यह लोग तर्क देते हैं कि येशु प्रभु का जन्मदिन मनाना उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह प्रस्तुत करने के बराबर है। मुझे उनका यह तर्क हास्यास्पद लगता है। मैं साबित करुंगा कि कैसे यह हास्यास्पद है। पहली बात मैं उनसे कहना चाहूंगा कि येशु प्रभु की मानवता का इनकार करके आप लोग कैसे कह सकते हो परमेश्वरपुत्र का नाम “येशु मसीह” हैं। जब आप नाम “येशु” कहते हैं तो आप उस ईश्वर की बात करते हैं जो हमारी तरह हड्डी मांस वाला मनुष्य है। नहीं तो आप कभी भी नाम “येशु” नहीं कह पाएंगे। दूसरी बात यह है कि उनका मनुष्य के रूप में जन्म लेना ही तो खुशी का विषय है। वह ईश्वर है और इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु वह मानव बने और यही तो आनंद और खुशी का विषय है। इस सच्चाई को प्रभु येशु मसीह के कदमों में रहकर सीखने वाले संत यूहन्ना इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-

“14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा”
(संत यूहन्ना 1:14 http://www.bible2all.com).

यह आनंद का विषय है कि वह हमेशा (अनंत) के लिए मानव बन गये। यह हमारे लिए आनंद का विषय है कि वह स्वर्ग में अभी भी हाड़-मांस के उसी शरीर के साथ विराजमान हैं। वह आसमान फाड़कर स्वर्गदूतों के साथ हड्डी मांस के उसी शरीर के साथ अवतरित होंगे। उनकी मानवता तो खुशी का विषय है। उनके ईश्वरत्व को कौन नकार रहा है? सवाल यह है कि आप उनकी मानवता को क्यों नकार रहे हो? इस बात से क्यों इंकार कर रहे हो कि वह 100% मनुष्य है? क्यों अशांत हो रहे हो? उसके ईश्वरत्व के साथ साथ मनुष्यत्व हजम क्यों नहीं हो रहा है?

आइये अब क्रिसमस विरोधी ईसाईयों के दूसरे तर्क की तरफ देखते हैं।

2. क्रिसमस त्यौहार का वर्णन पवित्र शास्त्र बाइबल में नहीं है-

इस तर्क के साथ यह घोर क्रिसमस विरोधी सवाल पूछते हैं कि बाइबल में कहां लिखा है कि क्रिसमस मनाओ? पवित्र बाइबल में कोई घटना बताओ जिसमें क्रिसमस मनाने का वर्णन हो। इसका जवाब इन्ही की भाषा में दे सकते हैं। एक सवाल पूछकर, “बाइबल में कहां लिखा है कि क्रिसमस मत मनाओ?” लेकिन हम ऐसा न करके दूसरे तरीके से उचित जवाब देते हैं।

यह सही है कि बाइबल में कहीं भी नहीं लिखा है कि क्रिसमस मनाओ या फिर किसी ने बाइबल की घटनाओं में क्रिसमस मनाया हो। यहां तक ठीक है। समस्या यह है कि यह लोग सिर्फ इस आधार पर क्रिसमस का विरोध करते हैं जबकि उन्हें यह अधिकार रत्ती भर भी नहीं है। इनकी बहुत बड़ी गलती मैं साबित करता हूं। प्रथम शताब्दी में बहुत सारे इन जैसे लोग थे जो त्यौहारों और विशेष दिनों को मनाने का विरोध करते थे। ऐसे लोगों को उनकी मूर्खता से रोकने के लिए संत पौलुस ने स्पष्ट लिखा- “

16 इसलिये खाने पीने या पर्व या नए चान्द, या सब्तों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे।
(कुलुस्सियों 2:16 http://www.bible2all.com).

क्या क्रिसमस त्यौहार का विरोध करके यह लोग बाइबल विरोधी नहीं हैं? मसीहियों में फूट डालकर और सर्वश्रेष्ठता का दावा करने वाले ये तथाकथित मसीही कौनसी आत्मा के हैं? प्रेम रहित और घमंड से भरे यह लोग क्या हासिल करना चाहते हैं? मुझे नहीं लगता कि ऐसे लोग सुधरेंगे लेकिन सच्चाई से प्रेम करने वाले प्रभुभक्तों के लिए कुछ और पवित्र वचन पेश करता हूं ताकि वे लोग क्रिसमस विरोधी बकवादियों को जवाब दे सकें-

“कोई तो एक दिन को दूसरे से बढ़कर जानता है, और कोई सब दिन एक सा जानता है: हर एक अपने ही मन में निश्चय कर ले। जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिये मानता है: जो खाता है, वह प्रभु के लिये खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जा नहीं खाता, वह प्रभु के लिये नहीं खाता और परमेश्वर का धन्यवाद करता है” (रोमियो 14:5-6 http://www.bible2all.com).

इन लोगों को समझना चाहिए कि जितना इनको क्रिसमस नहीं मनाने का अधिकार है उतना ही दूसरों को मनाने का अधिकार है। ये कौन होते हैं निर्णय लेने वाले कि हम क्रिसमस मनायें या नहीं? सबको यह मनाने का अधिकार बाइबल सम्मत है लेकिन उनको विरोध करने का अधिकार कतई नहीं है। मुझे कोई अधिकार नहीं है कि किसी को क्रिसमस मनाने के लिए विवश करूं और मैं कभी करूंगा भी नहीं। मैं तो क्या कोई भी नहीं कर सकता क्योंकि हर्षोल्लास दिल से होता है बाहर से नहीं। मैं यह साबित कर चुका हूं कि किसी को भी विरोध करने का अधिकार नहीं है। अब ये लोग चुप रहें और विद्रोही बनकर लोगों का हर्षोल्लास का मन खराब न करें। कम से कम प्रभु से तो डरें।

ऐ मसीहियों, फक्र करो—- मसीही शायरी

फक्र करो कि तुम रब के हो
सब तुम्हारे हैं तुम सब के हो
रहोगे अब्द तक मुबारक हो
भूल जाओ कि तुम कब के हो

गुरुर मत करना अपने अमल पे
जहाँ भी न था,तुम चुने तब के हो
कब्र हार गयी हैं ये मनादी करो
तो काहे को तुम रहते दब के हो

2. मसीहा आएंगे……….
ये नज़रें ढूंढेगी नहीं, यूँ हमेशा
दर्द में बरसेगी नहीं, यूँ हमेशा
करेगी दीदार, यूँ चमक उठेगी
इंतजार में तरसेगी न यूँ हमेशा

3. मसीहा तू….
जलाली हैं तू मसीहा, जलाली हैं तू
शहंशाह हैं तू, जनाब ए आली हैं तू
जलवागर तू मसीहा जलवागर हैं तू
रोशनी जहां की, नूर ए नजर हैं तू

क्या क्रिसमस मनाना उचित/जरुरी हैं?

इस विषय पर यह अतिमहत्वपूर्ण लेख लिखने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि भारत में तथा दुनिया के अन्य देशों में बहुत सारे ऐसे ईसाई हैं जो क्रिसमस मनाने का विरोध करते हैं। यह लोग न तो खुद क्रिसमस को आनंद मनाते हैं और न ही चाहते हैं कि कोई अन्य लोग आनंदित होने पाएं। इन में से कुछ क्रिसमस मनाने से इतने परेशान हैं कि क्रिसमस के दिन उपवास रख देते हैं।

दूसरी तरफ ईसाईयों के साथ साथ बहुत सारे हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिक्ख एवं अन्य धर्मों के लोग हैं जो क्रिसमस का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हमारे बहुत सारे गैर ईसाई मित्र भी उम्मीद करते हैं कि हम उन्हें क्रिसमस की पार्टी दें। वे बड़ी उत्सुकता से क्रिसमस का इंतजार करते हैं। अभी हम क्रिसमस त्यौहार को मनाने का विरोध करने वाले ईसाईयों के तर्कों और उनकी वैधता पर विचार करेंगे। साथ ही साथ शास्त्र सम्मत विचार प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। क्रिसमस विरोधी ईसाईयों के कुछ तर्क इस प्रकार है—-

1. येशु परमेश्वर है इसलिए वह अजन्मे हैं-

यह विचारधारा इस प्रकार है कि, ईश्वर सबकुछ का जन्मदाता है और उसका कोई सृष्टिकर्ता नहीं, इसलिए उसका जन्म संभव ही नहीं है। यह लोग तर्क देते हैं कि येशु प्रभु तो उनके जन्म से पहले अस्तित्व में थे (संत यूहन्ना 1). मानव स्वरुप से ज्यादा उनका ईश्वरीय स्वरुप महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव रूप में अवतरित होने से पहले इस पृथ्वी और उस लोक (स्वर्ग) पर उनका शासन चल रहा था। इस तरह यह लोग तर्क देते हैं कि येशु प्रभु का जन्मदिन मनाना उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह प्रस्तुत करने के बराबर है। मुझे उनका यह तर्क हास्यास्पद लगता है। मैं साबित करुंगा कि कैसे यह हास्यास्पद है। पहली बात मैं उनसे कहना चाहूंगा कि येशु प्रभु की मानवता का इनकार करके आप लोग कैसे कह सकते हो परमेश्वरपुत्र का नाम “येशु मसीह” हैं। जब आप नाम “येशु” कहते हैं तो आप उस ईश्वर की बात करते हैं जो हमारी तरह हड्डी मांस वाला मनुष्य है। नहीं तो आप कभी भी नाम “येशु” नहीं कह पाएंगे। दूसरी बात यह है कि उनका मनुष्य के रूप में जन्म लेना ही तो खुशी का विषय है। वह ईश्वर है और इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु वह मानव बने और यही तो आनंद और खुशी का विषय है। इस सच्चाई को प्रभु येशु मसीह के कदमों में रहकर सीखने वाले संत यूहन्ना इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-

“14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा”
(संत यूहन्ना 1:14 http://www.bible2all.com).

यह आनंद का विषय है कि वह हमेशा (अनंत) के लिए मानव बन गये। यह हमारे लिए आनंद का विषय है कि वह स्वर्ग में अभी भी हाड़-मांस के उसी शरीर के साथ विराजमान हैं। वह आसमान फाड़कर स्वर्गदूतों के साथ हड्डी मांस के उसी शरीर के साथ अवतरित होंगे। उनकी मानवता तो खुशी का विषय है। उनके ईश्वरत्व को कौन नकार रहा है? सवाल यह है कि आप उनकी मानवता को क्यों नकार रहे हो? इस बात से क्यों इंकार कर रहे हो कि वह 100% मनुष्य है? क्यों अशांत हो रहे हो? उसके ईश्वरत्व के साथ साथ मनुष्यत्व हजम क्यों नहीं हो रहा है?

आइये अब क्रिसमस विरोधी ईसाईयों के दूसरे तर्क की तरफ देखते हैं।

2. क्रिसमस त्यौहार का वर्णन पवित्र शास्त्र बाइबल में नहीं है-

इस तर्क के साथ यह घोर क्रिसमस विरोधी सवाल पूछते हैं कि बाइबल में कहां लिखा है कि क्रिसमस मनाओ? पवित्र बाइबल में कोई घटना बताओ जिसमें क्रिसमस मनाने का वर्णन हो। इसका जवाब इन्ही की भाषा में दे सकते हैं। एक सवाल पूछकर, “बाइबल में कहां लिखा है कि क्रिसमस मत मनाओ?” लेकिन हम ऐसा न करके दूसरे तरीके से उचित जवाब देते हैं।

यह सही है कि बाइबल में कहीं भी नहीं लिखा है कि क्रिसमस मनाओ या फिर किसी ने बाइबल की घटनाओं में क्रिसमस मनाया हो। यहां तक ठीक है। समस्या यह है कि यह लोग सिर्फ इस आधार पर क्रिसमस का विरोध करते हैं जबकि उन्हें यह अधिकार रत्ती भर भी नहीं है। इनकी बहुत बड़ी गलती मैं साबित करता हूं। प्रथम शताब्दी में बहुत सारे इन जैसे लोग थे जो त्यौहारों और विशेष दिनों को मनाने का विरोध करते थे। ऐसे लोगों को उनकी मूर्खता से रोकने के लिए संत पौलुस ने स्पष्ट लिखा- “

“इसलिये खाने पीने या पर्व या नए चान्द, या सब्तों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे।”
(कुलुस्सियों 2:16 http://www.bible2all.com).

क्या क्रिसमस त्यौहार का विरोध करके यह लोग बाइबल विरोधी नहीं हैं? मसीहियों में फूट डालकर और सर्वश्रेष्ठता का दावा करने वाले ये तथाकथित मसीही कौनसी आत्मा के हैं? प्रेम रहित और घमंड से भरे यह लोग क्या हासिल करना चाहते हैं? मुझे नहीं लगता कि ऐसे लोग सुधरेंगे लेकिन सच्चाई से प्रेम करने वाले प्रभुभक्तों के लिए कुछ और पवित्र वचन पेश करता हूं ताकि वे लोग क्रिसमस विरोधी बकवादियों को जवाब दे सकें-

“कोई तो एक दिन को दूसरे से बढ़कर जानता है, और कोई सब दिन एक सा जानता है: हर एक अपने ही मन में निश्चय कर ले। जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिये मानता है: जो खाता है, वह प्रभु के लिये खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जा नहीं खाता, वह प्रभु के लिये नहीं खाता और परमेश्वर का धन्यवाद करता है” (रोमियो 14:5-6 http://www.bible2all.com).

इन लोगों को समझना चाहिए कि जितना इनको क्रिसमस नहीं मनाने का अधिकार है उतना ही दूसरों को मनाने का अधिकार है। ये कौन होते हैं निर्णय लेने वाले कि हम क्रिसमस मनायें या नहीं? सबको यह मनाने का अधिकार बाइबल सम्मत है लेकिन उनको विरोध करने का अधिकार कतई नहीं है। मुझे कोई अधिकार नहीं है कि किसी को क्रिसमस मनाने के लिए विवश करूं और मैं कभी करूंगा भी नहीं। मैं तो क्या कोई भी नहीं कर सकता क्योंकि हर्षोल्लास दिल से होता है बाहर से नहीं। मैं यह साबित कर चुका हूं कि किसी को भी विरोध करने का अधिकार नहीं है। अब ये लोग चुप रहें और विद्रोही बनकर लोगों का हर्षोल्लास का मन खराब न करें। कम से कम प्रभु से तो डरें।

क्रिसमस पर महान लोगों के विचार

1.पोप फ्रांसिस————”जैसे कि हम क्रिसमस की कथा पर विचार करते हैं, हमें एक आध्यात्मिक यात्रा के लिए आमंत्रित किया जाता है, जो परमेश्वर की विनम्रता से शुरू होती है, जो (प्रभु) हर पुरुष और महिला से मिलने के लिए मनुष्य बन गया। इससे हमें पता चलता है कि हमारे लिए उसका प्यार इतना महान है कि वह हम में से एक बन गया, ताकि हम बदले में उसके साथ एक हो सकें” (catholicherald.co.uk).

2. पोप पॉल VI ————”हम क्रिसमस को मिलन, महान मिलन, ऐतिहासिक मुलाकात, परमेश्वर और मानव जाति के बीच निर्णायक मुलाकात मानते हैं। जिसे विश्वास है, वह इसे सही मायने में जानता है और वह आनन्दित हों” (poemofquotes.com).

3. क्रिस्टीना रोसेट्टी————-“क्रिसमस पर प्यार अवतरित हुआ; सबसे प्यारा प्यार, दिव्य प्यार; प्यार क्रिसमस पर पैदा हुआ था और सितारों और स्वर्गदूतों ने संकेत दिया था “(poemofquotes.com).

4. नॉर्मन विंसेंट पील———-“क्रिसमस इस पूरी दुनिया पर एक जादू की छड़ी सी चला देता है, और देखो, सब कुछ कोमल और अधिक सुंदर हो जाता है” (success.com).

5. बाॅब होप——————–”क्रिसमस पर मेरा विचार, चाहे वह पुराने जमाने का समझो या आधुनिक, बहुत ही सरल है: “दूसरों से प्यार करना” success.com).

6. वाशिंगटन इरविंग ———– “क्रिसमस रसोई में आतिथ्य के लिए आग जलाने के लिए और दिल में दान की लौ लगाने के लिए एक मौसम है” (www.success.com)

ईश्वरभक्ति: सैक्स एवम् विवाह

आज भारत और विश्व के तमाम देशों में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सैक्स को अपवित्र, ग़लत, अनात्मिक, शैतानी या पाप मानते हैं। इनकी मानसिकता यह है कि कैसे भी करके सैक्स को जीता जाए क्योंकि यह अध्यात्म का शत्रु हैं। दूसरी तरफ ऐसे तमाम लोगों से पूछने वाले लोग पूछते हैं कि बिना सैक्स आप लोग पैदा कहां से हुऐ? सैक्स इतना ही अपवित्र होता तो आपकी उत्पति एक पवित्र ईश्वर, इस अपवित्र माध्यम से क्यों करता? सैक्स के विरोधी ऐसे तथाकथित आध्यात्मिक लोग हैं जिन्होंने बहुत सारे परिवार तबाह कर दिए हैं। इस विचारधारा ने कई हंसती खेलती बहनों को पति के जीते जी विधवा बना दिया है। कई बालकों से उनके माता पिता छीनकर उन्हें अनाथ बना डाला है। आइये देखते हैं कि पवित्र शास्त्र की इस विषय में क्या राय है। परमेश्वर का वचन कहता है कि सृष्टि का प्रथम जोड़ा ईश्वर ने बनाया।

“तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो” (उत्पत्ति 1:27-28 http://www.bible2all.com).

यहां यह गौर करने योग्य बात है कि ईश्वर ने फलने फूलने की आशीष दी और फलना फूलना सैक्स के द्वारा ही संभव हैं। मनुष्य के लिए सैक्स का आनंद उसकी पवित्र योजना का हिस्सा है।

आज से 2000 साल पहले, पवित्र वचन में संत पौलुस ने ऐसे लोगों के खिलाफ लिखा है जो विवाह का विरोध करेंगे एवम् आध्यात्मिकता को सैक्स से जोड़ेंगे-

“परन्तु आत्मा स्पष्टता से कहता है, कि आने वाले समयों में कितने लोग भरमाने वाली आत्माओं, और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास से बहक जाएंगे। यह उन झूठे मनुष्यों के कपट के कारण होगा, जिन का विवेक मानों जलते हुए लोहे से दागा गया है। जो ब्याह करने से रोकेंगे, और भोजन की कुछ वस्तुओं से परे रहने की आज्ञा देंगे; जिन्हें परमेश्वर ने इसलिये सृजा कि विश्वासी, और सत्य के पहिचानने वाले उन्हें धन्यवाद के साथ खाएं। क्योंकि परमेश्वर की सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है: और कोई वस्तु अस्वीकार करने के योग्य नहीं; पर यह कि धन्यवाद के साथ खाई जाए” (1 तीमुथियुस 4:1-4 http://www.bible2all.com).

कुछ कुछ ऐसे भी हैं जो तमाम तरह की कोशिशें करने के बाद भी जब सैक्स को नियंत्रित नहीं कर पाते तो कुछ नशे की वस्तुएं तथा जड़ी बूटियां इस्तेमाल करते हैं। बहुत से ऐसे भी हैं जो आत्मग्लानि में अपने गुप्तांग ही काट डालते हैं। बहुत से ऐसे भी हैं जिन्होंने भरसक प्रयास किये और जब सैक्स को नियंत्रित नहीं कर पाऐ तो वापस व्यभिचार में उलझ गए और अपने निवास स्थान को वैश्यावृति या बलात्कार का अड्डा बना डाला। कुछ वह भी है जो खुद को कोस कोसकर खुद के प्रति घृणा से भर गये और पागल हो गये हैं। यह सब उन विचारधाराओं के कारण हुआ है जिसमें सैक्स अपवित्र माना गया है तथा इसको कैसे भी करने जीतने के लिए उकसाया जाता है।

बाबुलवासी प्रभुभक्तों को ईश्वर का स्पष्ट संदेश इस प्रकार था-

“घर बना कर उन में बस जाओ; बारियां लगा कर उनके फल खाओ। ब्याह कर के बेटे-बेटियां जन्माओ; और अपने बेटों के लिये स्त्रियां ब्याह लो और अपनी बेटियां पुरुषों को ब्याह दो, कि वे भी बेटे-बेटियां जन्माएं; और वहां घटो नहीं वरन बढ़ते जाओ” (भविष्यवक्ता यिर्मयाह 29:5-6 http://www.bible2all.com).

इन तमाम बातों को ध्यान में रखकर हम यह समझें कि सैक्स कहीं भी ईश्वरभक्ति में रूकावट नहीं है और परिवारों को नष्ट करके राष्ट्र की हानि करने वाली ऐसे विचारों से बचें। परिवार के साथ ईश्वरभक्ति का आनंद लें जैसा कि संत हनोक के बारे में लिखा है-

“जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उसने मतूशेलह को जन्म दिया। और मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं। और हनोक की कुल अवस्था तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई। और हनोक परमेश्वर के साथ साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया” (उत्पत्ति 5:21-24 http://www.bible2all.com).

प्रभु आप सबको आशीष दे।

क्रिसमस का अद्भुत संदेश

क्रिसमस सब त्यौहारों से अलग अद्भुत पर्व है। इस बड़े दिन से संबंधित कई आश्चर्यजनक कहानियां प्रचलन में हैं। सबसे ज्यादा प्रचलित कहानी है -“तीन ज्योतिषियों (ज्ञानियों) की कहानी।” इस कहानी को सही तरीके से पढ़ने और समझने पर कई तरह के रहस्य समझ में आते हैं। यह तीन ज्ञानी परमेश्वर से सही संदेश को पाते हैं लेकिन पूरी तरह से सही तरीके से नहीं समझ पाते। इनकी अधूरी समझ के कारण बहुत ही भयानक नुकसान हुआ। त्राहि त्राहि मच गई। यह लोग परमेश्वर के संदेश को सही तरीके से नहीं समझे और अपनी सांसारिक अनुभवी बुद्धि का इस्तेमाल करके कई लोगों के विनाश का कारण बने। आज भी बहुत से लोग हैं जो क्रिसमस के असली संदेश को नहीं समझ पाते और अपने तथा दूसरों के बहुत से नुकसान करते हैं। कई नुकसान विनाशकारी हैं।

बाइबल में तीन ज्ञानियों की कहानी इस तरह से प्रचलन में हैं-

“हेरोदेस राजा के दिनों में जब यहूदिया के बैतलहम में यीशु का जन्म हुआ, तो देखो, पूर्व से कई ज्योतिषी यरूशलेम में आकर पूछने लगे। कि यहूदियों का राजा जिस का जन्म हुआ है, कहां है? क्योंकि हम ने पूर्व में उसका तारा देखा है और उस को प्रणाम करने आए हैं। यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया। और उस ने लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा, कि मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए? उन्होंने उस से कहा, यहूदिया के बैतलहम में; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा यों लिखा है, कि हे बैतलहम, जो यहूदा के देश में है, तू किसी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सब से छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल की रखवाली करेगा। तब हेरोदेस ने ज्योतिषियों को चुपके से बुलाकर उन से पूछा, कि तारा ठीक किस समय दिखाई दिया था। और उस ने यह कहकर उन्हें बैतलहम भेजा, कि जाकर उस बालक के विषय में ठीक ठीक मालूम करो और जब वह मिल जाए तो मुझे समाचार दो ताकि मैं भी आकर उस को प्रणाम करूं। वे राजा की बात सुनकर चले गए, और देखो, जो तारा उन्होंने पूर्व में देखा था, वह उन के आगे आगे चला, और जंहा बालक था, उस जगह के ऊपर पंहुचकर ठहर गया. उस तारे को देखकर वे अति आनन्दित हुए। और उस घर में पहुंचकर उस बालक को उस की माता मरियम के साथ देखा, और मुंह के बल गिरकर उसे प्रणाम किया; और अपना अपना थैला खोलकर उसे सोना, और लोहबान, और गन्धरस की भेंट चढ़ाई। और स्वप्न में यह चितौनी पाकर कि हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए” (संत मत्ती 2:1-12 http://www.bible2all.com).

यह ज्ञानी बुद्धिमान तो थे और परमेश्वर द्वारा दिखाए गए चिन्हों को समझते थे मगर राजा की चालाकी को नहीं समझ पाए। वह तो बच्चे येशु मसीह की हत्या करना चाहता था। वह लोग राजा की इस राजनीति को नहीं समझ पाए। यह भी है कि वह अपने अनुभव और सांसारिक ज्ञान के कारण प्रभू ईसा मसीह को गलत जगह पर ढूंढ रहे थे। उनके अनुभव से ही उन्होंने यह धोखा खाया कि राजा तो राजमहल में ही जन्मा होगा। यहां इन्होंने परमेश्वर के प्रकाशन का इंतजार न करके अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। अगर हम भी परमेश्वर के प्रकाशन पर निर्भर नहीं होते और मनमाने तरीके से क्रिसमस मनाते हैं तो हम मना तो लेंगे लेकिन वह सही अर्थों में क्रिसमस मनाना नहीं कहलाएगा।

हमने उपरोक्त कहानी में यह भी पढ़ा कि दूसरी तरफ ऐसे धर्मगुरु भी थे जिनको परमेश्वर के वचन का ज्ञान था। इसीलिए उन्होंने बता दिया कि प्रभु यीशु मसीह का अवतार कहां होना चाहिए। ताज्जुब कि बात है कि इन्हे भी नहीं मालूम कि प्रभु का जन्म हो चुका है। इस वर्ग की भी समस्या यह थी कि इन्हे परमेश्वर का प्रकाशन नहीं था। इन्हें परमेश्वर के वचन का ज्ञान था लेकिन परमेश्वर से व्यक्तिगत संबंध नहीं था।

हमने देखा कि एक वर्ग परमेश्वर द्वारा दिखाए गए चिन्हों को तो को तो समझ पाया था और जान लिया था कि प्रभु का जन्म हो चुका है लेकिन यह नहीं समझ पाया कि प्रभु कहां जन्मे हैं। दूसरा वर्ग यह जानता था कि प्रभु का जन्म कौनसे स्थान में होना चाहिए कि लेकिन यह नहीं समझ पाया कि प्रभु का जन्म हो चुका है।

इन दोनों वर्गों की सूचनाओं के आधार पर ही राजा हेरोदेस ने खून की होली खेली, जो आगे की कहानी में वर्णित है-

“जब हेरोदेस ने यह देखा, कि ज्योतिषियों ने मेरे साथ ठट्ठा किया है, तब वह क्रोध से भर गया; और लोगों को भेजकर ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार बैतलहम और उसके आस पास के सब लड़कों को जो दो वर्ष के, या उस से छोटे थे, मरवा डाला। तब जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हुआ, कि रामाह में एक करूण-नाद सुनाई दिया, रोना और बड़ा विलाप, राहेल अपने बालकों के लिये रो रही थी, और शान्त होना न चाहती थी, क्योंकि वे हैं नहीं॥ हेरोदेस के मरने के बाद देखो, प्रभु के दूत ने मिस्र में यूसुफ को स्वप्न में दिखाई देकर कहा कि उठ, बालक और उस की माता को लेकर इस्राएल के देश में चला जा; क्योंकिं जो बालक के प्राण लेना चाहते थे, वे मर गए” (संत मत्ती 2:16-20 http://www.bible2all.com).

इस प्रकार हम देखते हैं कि इन दोनों वर्गों की कमजोरी के कारण इतनी जानें गईं। प्रभु से हमारी यह प्रार्थना हो कि हम हमारे अनुभव या ज्ञान पर निर्भर न होकर, परमेश्वर के प्रकाशन पर निर्भर हों, ताकि हम सही अर्थों में क्रिसमस मना पाऐं‌।

तीसरा वर्ग ऐसा था जो इन दोनों से हर बात में कमतर था। उनके पास इतना ज्ञान तथा बुद्धि नहीं थी। उनकी एक ही खासियत थी कि उनको परमेश्वर का स्पष्ट प्रकाशन मिला था। यह रोचक कहानी इस प्रकार है-

“और उस देश में कितने गड़ेरिये थे, जो रात को मैदान में रहकर अपने झुण्ड का पहरा देते थे। और प्रभु का एक दूत उन के पास आ खड़ा हुआ; और प्रभु का तेज उन के चारों ओर चमका, और वे बहुत डर गए। तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिये होगा। कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है। और इस का तुम्हारे लिये यह पता है, कि तुम एक बालक को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे। तब एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ स्वर्गदूतों का दल परमेश्वर की स्तुति करते हुए और यह कहते दिखाई दिया। कि आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है शान्ति हो॥ जब स्वर्गदूत उन के पास से स्वर्ग को चले गए, तो गड़ेरियों ने आपस में कहा, आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें। और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को और चरनी में उस बालक को पड़ा देखा। इन्हें देखकर उन्होंने वह बात जो इस बालक के विषय में उन से कही गई थी, प्रगट की। और सब सुनने वालों ने उन बातों से जो गड़िरयों ने उन से कहीं आश्चर्य किया। परन्तु मरियम ये सब बातें अपने मन में रखकर सोचती रही। और गड़ेरिये जैसा उन से कहा गया था, वैसा ही सब सुनकर और देखकर परमेश्वर की महिमा और स्तुति करते हुए लौट गए” (संत लूका 2:8-20 http://www.bible2all.com).

हम भी यह उम्मीद रखें और प्रार्थना करें कि पवित्र प्रभु हमारी मन की आंखों को ज्योतिर्मय करें ताकि हमको समझ में आए कि असली क्रिसमस क्या हैं और इस दिन को जन्म लेने वाले प्रभु का हमारे जीवन से क्या संबंध है।

आप सबको क्रिसमस की शुभकामनाएं।

मसीही शायरी- “मसीहा की मुहब्बत”

गुनाहों के अँधेरे की भी क्या बात थी
पर मसीहा के सामने क्या बिसात थी
मेरी ज़िंदगी तो थी वीरान वीरान सी
दिल में काले गम की अँधेरी रात थी
बस घेरे थे निराशाओं के बादल मुझे
यूँ हर तरफ बस दर्द की सौगात थी

मैंने ढूँढा ना उसको, वो ही खुद आया
ये उसकी रहमत और निराली बात थी
मैं अपनी ताकत से ढूंढ लूं क्या उसको
मुझ नाचीज की ये कहाँ से औकात थी

मसीहा मिले तो महसूस हुआ मुझे भी
जैसे हर ओर खुशियों की बरसात थी
मिट चुका था मेरा अकेलापन भी पूरा
अपनाने को विश्वासियों की जमात थी

उठते हैं हाथ उसकी इबादत में ही
वरना इन हाथों में तो खुराफात थी
बदलता है बस मसीहा का करिश्मा
वरना यूँ किसमें इतनी करामात थी