बिना देखे विश्वास करते हैं लेकिन बिना सोचे नहीं

मुझे कई लोगों ने यह सवाल किया है कि, “क्या तुमने येशु मसीह को देखा है?” मैं उन लोगों पर कुछ दोष नहीं लगाता क्योंकि उनकी शंका और मन की स्थिति को मैं समझ सकता हूँ। एक समय मेरे भी जीवन में ऐसा ही था जब मेरे मन में ऐसे ही सवाल उठते थे। फिर मैं इन लोगों पर इन लोगों के सवालों के कारण क्यों झुँझलाऊँ? उनके मन की दुविधा को समझ सकते हैं लेकिन यह भी एकदम सत्य है कि हम विश्वास तो बिना देखे ही करते है मगर बिना सोचे नहीं। संत थॉमस ने तब तक प्रभु येशु मसीह के मुर्दों में से जी उठने पर विश्वास नहीं किया जब तक उन्होंने खुद अपनी आँखों से प्रभु येशु मसीह को जीवित नहीं देख लिया (संत यूहन्ना 20:24-29). प्रभु येशु मसीह के दर्शन से पहले संत थॉमस के पास प्रभु येशु के शिष्य आये और संत थॉमस को बताया कि उन सबने प्रभु येशु को जीवित देखा है लेकिन संत थॉमस ने उनकी गवाही को सिरे से नकार दिया (संत यूहन्ना 20:24-25).

प्रभु येशु मसीह ने संत थॉमस के संदेह को गंभीरता से लिया और दर्शन देकर विश्वासी बनाया। इसका क्या हम यह मतलब निकालें कि जब तक प्रभु हमें दर्शन नहीं देते, हम विश्वास नहीं करेंगे ? क्या हम संत थॉमस के शक के कारण यह लाइसेंस ले सकते हैं कि हमें भी तब तक शक करने का अधिकार है जब तक प्रभु हमें दर्शन नहीं देते ? इन सबसे बढ़कर बात यह हैं कि इन सब सवालों के बारे में प्रभु येशु मसीह का नजरिया क्या है ? क्या उन्होंने थॉमस के शक या अविश्वास को सराहा ? प्रभु येशु के शब्द देखें जो हम सब मसीहियों को तसल्ली देते है-

“तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्‍वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया” https://www.bible.com/hi/bible/1683/JHN.20.29.HINDI-BSI.

इन वचनों से साफ़ प्रतीत होता है कि प्रभु येशु यही चाहते थे कि प्रेरितों के अलावा तमाम उनको “बिना देखे ” उन पर विश्वास करें (संत यूहन्ना 20:29). एक और पवित्र वचन में प्रभु येशु ने यह चाहत प्रकट की है और हम बिना देखे विश्वास करने वालों के लिए प्रार्थना की है-

“मैं केवल इन्‍हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्‍तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों” eastindia.bibleportals.org/?q=bible/3/JHN/17. इस पवित्र वचन में प्रभु की चाहत यह है कि हम तमाम मसीही प्रथम शताब्दी के उन तमाम गवाहों की गवाही के ऊपर विश्वास करें कि प्रभु येशु मसीह जीवित है। क्यों न विश्वास करें जब संत थॉमस इजराइल से भारत आये और दक्षिण भारत में प्रभु येशु मसीह के जी उठने की गवाही दी और शहीद भी हुए (उनकी कब्र तमिलनाडु के चेन्नई प्रान्त में बनी हुई है तथा इस कब्र के ऊपर मैंने लिखा देखा है- “My Lord, my God (मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर)” (संत यूहन्ना 20:28).

हमें चाहे कितना भी शक की लहरें घेरें मगर हमारे दिमाग में यह चीज मजबूती देती है कि अगर संत थॉमस जैसा शक्की इंसान विश्वासी बना और भारत में आकर अपना बलिदान उसी गवाही के लिए दिया है तो जरूर यह घटना सच है। नहीं तो यह शक्की विश्वासी कैसे हो गया ? आखिर उसने 2000 साल पहले भारत आने की जोखिम क्यों उठायी ? कौन झूठ के लिए अपनी जान देगा ? आखिर जान से बढ़कर क्या हो सकता है ? यह सारी बातें यही दर्शाती है कि हम बिना देखे विश्वास करते है लेकिन बिना सोचे नहीं। और हाँ। सबसे ख़ास बात ! प्रभु आज भी चिन्ह और चमत्कार दिखा कर भी हमारे विश्वास को मजबूत बनाता है। बेशक हम बिना देखे विश्वास करते है मगर बिना सोचे नहीं।

आरजू है हर तरफ दिखे मसीहा- मसीही गजल

थोड़ा रहमो करम इधर कर दे
तू मेरी दुआओं में असर कर दे

होना है मुझको बेपरवाह ऐसा
अब सारे जहाँ से बेखबर कर दे

एक तू ही मेरी मंजिल बन जाये
तुझी को तू मेरा नूरेनजर कर दे

अब दिल न लगे, मेरा कहीँ भी
खुद को मेरा लख्तेजिगर कर दे

आरजू है हर तरफ दिखे मसीहा
दिल ए हस्ती में ये मंजर कर दे

शक्ति कैसे पाएं? विश्वासियों के लिए उत्तम सन्देश

प्रभु येशु मसीह के दुखों, मृत्यु, जी उठने तथा शरीर समेत स्वर्गारोहण के गवाह संत पतरस इस सवाल का जवाब साफ़ साफ़ और सलीके से देते है (1 पतरस 5:1). शक्ति किसको नहीं चाहिए? हम सबको बीमारियों, समस्याओं तथा चुनौतियों पर जय पाने हेतु शक्ति चाहिए। समय समय पर हमें इसकी जरुरत पड़ती रहती है। हमारी चिंताओं या डर के ऊपर विजय पाने के लिए हम सबको शक्ति चाहिए। इस शक्ति की जरुरत की पूर्ती का उपाय संत पतरस सुन्दर तरीके से वर्णित करते है (1 पतरस 5:10). वह तरीके आगे वर्णित बिंदुओं में प्रकट है-

(अ) खुद को विनम्र करें (1 पतरस 5:6)-

संत पतरस यहां पर कहते है कि, ”खुद को परमेश्वर के शक्तिशाली हाथ के नीचे विनम्र करें ताकि उचित समय पर वह आपको ऊपर उठाये” (1पतरस 5:6 English Standard Version से अनुवादित). यह परमेश्वर का तरीका है, ऊँचा उठाने का, और हम मनमानी नहीं कर सकते, इस मामले में। विनम्रता का अर्थ संत पतरस के हिसाब से यह भी है कि, ”तुम जो उम्र में छोटे हो, बड़ी उम्र वालों के अधीन रहो। तुम सब एक दूसरे के प्रति विनम्रता को पहन लो, क्योंकि परमेश्वर घमंडियों का विरोध करता है, परन्तु विनम्र को कृपा देता है” (1पतरस 5:5 E.S.V. से अनु.). इसलिए ”परमेश्वर के शक्तिशाली हाथ के नीचे विनम्र” होने का तात्पर्य यह भी है कि अगुवों या उम्र दराज अनुभवी लोगों को समर्पित हो जाएँ और तभी परमेश्वर अपने ”शक्तिशाली हाथ” से शक्ति प्रदान करके ”उचित समय पर वह आपको ऊपर उठायेगा” (1पतरस 5:6 E.S.V. से अनुवादित).

(ब) अपनी सारी चिंताओं को उस पर (परमेश्वर पर) डाल दो (1 पतरस 5:7)-

यहां पर संत पतरस ”सारी चिंताओं को उस पर” डालने का कारण यह बताते है कि ”वह आपकी देखभाल करता है” (1 पतरस 5:7 E.S.V. से अनु.). चिंताएं, जरूरतें तथा परेशानियां हमें घबराहट में डाल सकती है तथा कई तरह की मुसीबतें और बढ़ा सकती है, या हमारी समस्या को बढ़े चढ़े रूप में प्रकट कर सकती है। ऐसी परिस्थिति में जब हम विश्वास के साथ अपनी ”सारी चिंताओं को” परमेश्वर पर डाल देते है तो वह हमारी ”देखभाल करता है” (1 पतरस 5:7 E.S.V. से अनु.). देखभाल का सीधा सा तात्पर्य यह है कि वह हमें समस्याओं को सहने की शक्ति देगा या अपनी शक्ति हमें देकर हमीं से उस समस्या को हटवा देगा। शक्ति पाने की चाबी यह है कि ”अपनी सारी चिंताओं को उस पर डाल दो” (1पतरस 5:7 E.S.V. से अनु.).

(स) अच्छी मानसिकता रखें; चौकस रहें (1पतरस 5:8)-

संत पतरस हम सबको एक ख़ास मानसिक स्थिति में रहने का आदेश दे रहे है। दूसरे शब्दों में कहें तो सकारात्मक सोच और जागरूकता में रहना अनिवार्य है। किसलिए ? इस सवाल का जवाब संत पतरस के शब्दों में यह है कि ”तुम्हारी मुसीबत (शत्रु) शैतान गर्जना करने वाले शेर के समान चहुँ ओर घूम रहा है कि किसी न किसी को फाड़ डाले” (1 पतरस 5:8 E.S.V. से अनु.). जबकि हमारा खतरनाक प्राणघातक शत्रु शैतान ऐसी योजना हमारे खिलाफ बनाये हुए है तो हमें ”चौकसी” और ”अच्छी मानसिकता” में रहना होगा (1पतरस 5:8 E.S.V. से अनु.). हमारी ”चौकसी” और ”अच्छी मानसिकता” हमें शैतान का सामना करने के लिए तैयार करेगी, प्रशिक्षण देगी एवं हियाव देगी (1पतरस 5:8 E.S.V. से अनु.).

(द) ”उसका सामना करो” (1पतरस 5:9)-

यहां संत पतरस यह कह रहे है कि ”विश्वास में मजबूत होकर और यह जानकर शैतान का सामना करो कि ऐसे ही (आपकी ही की तरह) दुःख सारे संसार के आपके भाई बहन अनुभव कर रहे है” (1पतरस 5:9 E.S.V. से अनु.). यहां पर शक्ति पाने का तरीका यह है कि ”शैतान का सामना” करना है और वह भी ”यह सोचकर” कि मेरी ही तरह मेरे ”विश्व भर में बसने वाले” ”मसीही बंधु” शैतान के द्वारा ”दुःख उठा रहे है” (1पतरस 5:9 E.S.V. से अनु.). अपने दुःख को सहते हुए तथा अपने भाई बंधुओं के दुखों के साथ सहानुभूति रखते हुए ”शैतान का सामना” करने से हमें जयवंत होने की शक्ति प्राप्त होगी (1 पतरस 5:9 E.S.V. से अनु.). संत पतरस ने चाहा था कि हमें इस अहसास से शक्ति मिले कि शैतान के द्वारा दुःख उठाने वाले हम अकेले नहीं है।

इस प्रकार इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए और इन पर मनन एवं आचरण करते हुए हम शक्ति पा सकते है। हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तथा हरेक परिस्थिति में टिके रहकर जीत पाने के लिए हमें इन सब बातों पर मन लगाना चाहिए। शक्ति पाने का कोई शॉर्टकट नहीं है बल्कि धीरज के साथ इन बातों पर अमल करें। अनुग्रह एवं जय का परमेश्वर आपको शक्ति दे। आमीन।

अपनी पत्नी से प्यार कैसे करें ? पतियों के लिए सबसे ख़ास सन्देश

इस लेख में मैं यह नहीं बताने जा रहा हूँ कि पत्नी से प्यार करने के क्या क्या तरीके है। जी हाँ। मैं इस लेख में यह बताने जा रहा हूँ कि पत्नी से प्यार करना कैसे संभव हो सकता है? या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो- “तमाम प्यार न करने (या प्यार न कर पाने) के कारणों के बावजूद कैसे अपनी पत्नी से प्यार करें।” मेरे इस वाक्य का अर्थ यह है कि अपनी पत्नी से प्यार न करने के बहुत से कारण होना स्वाभाविक है क्योंकि उसमें कई कमियां होंगी, लेकिन क्या उसके बावजूद भी पत्नी से प्यार करना संभव है?

हकीकत यह है कि तमाम कारणों के बावजूद पत्नी से प्यार करना संभव है। पत्नी की कमजोरियों, गलतियों, कमियों या गुनाहों के कारण प्यार करना मुश्किल है। परमेश्वर का वचन यह कभी नहीं कहता कि पत्नी की अच्छाई या किसी गुण के कारण उससे प्यार करना है। वास्तव में परमेश्वर का वचन इसके ठीक उल्टा कहता है। परमेश्वर का वचन तो यह कहता है कि-

“ऐसे ही हे पतियों, तुम अपनी पत्नियों के साथ समझदारी पूर्वक रहो। उन्हें निर्बल समझ कर, उनका आदर करो। जीवन के वरदान में उन्हें अपना सह उत्तराधिकारी भी मानो ताकि तुम्हारी प्रार्थनाओं में बाधा न पड़े” (1 संत पतरस 3:7 http://bibleglot.com/read/HinERV/1Pet.3/).

एक और वचन इस तरह से कहता है-

“हे पतियों, अपनी अपनी पत्‍नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया” (इफिसियों 5:25 http://northindia.bibleportals.org/?q=bible//EPH/5).

उपरोक्त दोनों ही वचनों में भाव बलिदान और सहनशीलता का है। मसीह ने चर्च से बेपनाह प्यार किया। उसी प्रेम के कारण मसीह अनंतकाल से चर्च की तरफ आकर्षित है। चर्च मसीह प्रभु की आँखों का तारा है। क्या यह चर्च की खूबियों या भक्ति के कारण है ? नहीं। बिलकुल नहीं। मसीह अपने निस्वार्थ प्रेम, अनुग्रह और रहम के कारण ही चर्च की तरफ आकर्षित है। इस सन्दर्भ में ही यह सवाल उठना चाहिए कि क्या तमाम कमजोरियों या गुनाहों के बावजूद पत्नी से प्रेम संभव है ? परम पवित्र प्रभु ने पापों के सामने असहाय चर्च से प्रेम किया। अगर पति लोग मसीह के प्रेम से नहीं सीखते तो पत्नियों से प्रेम असंभव है।

अगर प्रभु हमसे हमारे गलती या कमजोरी के हिसाब से व्यवहार करते तो हमसे नफरत या दुश्मनी ही करते। फिर तो उनके न्याय के हिसाब से हमें विनाश और अनंत नरक ही मिलता। अगर हम उस प्रभु येशु के बिना शर्त के प्रेम के ऋणी है तो यह हमारा भी बदले में फ़र्ज़ बनता है कि अपनी अपनी पत्नी से बिना शर्त का प्रेम करें। ऐसा अगर हम नहीं करते है तो हम मसीह के पवित्र प्रेम से गद्दारी करते है। मसीह के उस बलिदानी और निस्वार्थ प्रेम से सीखकर पत्नी से प्रेम करना संभव है। फिर उसमें चाहे कितनी भी कमियां क्यों न हो। इफिसियों 5:26-27 में यह स्पष्ट है कि मसीह चर्च को शुद्ध एवं पवित्र करता है। पवित्र बाइबिल के हिसाब से मसीह चर्च को अपने लहू, वचन एवं पवित्र आत्मा से पवित्र एवं शुद्ध करता है। यह कितनी अद्भुत और समझ से परे बात है कि अधर्मी मनुष्य को जान देकर मसीह अपने पाक लहू से पवित्र करता है। अब आप समझ सकते है कि मसीह के इस अद्भुत प्रेम से सीखकर और उसके प्रेम को दिल में बसाकर अपनी पत्नी से प्रेम संभव है। फिर उसमें चाहे कितनी भी कमियां क्यों न हो।

जीवन की पवित्रता : मसीही दृष्टिकोण

मसीही दृष्टिकोण के हिसाब से जीवन अपने आप में पवित्र है, क्योंकि जीवन का उत्पतिकर्ता परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर अनंत है एवं इसी कारण से परमेश्वर ने जीवन को भी अनंत ही बनाया। इसी कारण पवित्र बाइबिल में स्पष्ट लिखा है कि परमेश्वर ने मानव को अपने “स्वरूप एवं समानता” में निर्मित किया (उत्पति 1:26). कहने का सीधा तात्पर्य यह है कि यह शरीर, साँसें तथा भावनात्मक व्यक्तित्व इत्यादि सब कुछ पवित्र है। सेक्स, भूख एवं लालसा इत्यादि सब कुछ पवित्र है। मसीहत में अपवित्रता का अर्थ यह है कि पापकर्म के कारण शरीर एवं आत्मा में कुछ दोष या विकृति का वास हो चुका है मगर उसका तात्पर्य यह कभी नहीं हो सकता कि हम हमारे शरीर या शारीरिक इच्छाओं से यह सोचकर घृणा करने लगें कि हमारा शरीर अशुद्ध है। नहीं। हरगिज नहीं। शरीर की पवित्रता एवं अनंतता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पापी एवं धर्मी सब जीवित किये जायेंगे एवं स्वर्ग या नरक में अनंत काल तक शरीर के साथ डाले जाएंगे। यौन इच्छा एवं वैवाहिक सम्बन्ध पवित्र है क्योंकि सृष्टि के प्रथम जोड़े को परमेश्वर ने आशीष दी कि “फूलो फलो एवं पृथ्वी में भर जाओ” (उत्पति 1:28)। भोजन इत्यादि कि इच्छा पवित्र है क्योंकि परमेश्वर ने स्वाद एवं आनंद की अनुभूति के साथ जीवन का निर्माण किया और आशीष दी कि मनुष्य भोज्य पदार्थों का आनंद ले क्योंकि उसी के आनंद के लिए पेड़ पौधों इत्यादि का निर्माण किया गया (उत्पति 2:16). कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर अपनी लालसाओं के साथ अपने आप में पवित्र है। शरीर के किसी भी अंग में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपवित्र माना जाए।

गुड फ्राइडे पर बहुत छोटा सा सबसे ख़ास सन्देश

गुड फ्राइडे के दिन अगर कुछ याद करना है तो बस इतना ही याद करें कि आप परमेश्वर के लिए सबसे कीमती हैं। यहां तक कि आप उसको उसकी जान से भी प्यारे है। हो सकता है आपकी नज़र में आपकी कोई कीमत न हो। हो सकता है आपके पारिवारिक सदस्यों, रिश्तेदारों या जान पहचान वालों ने आपको अहसास दिलाया होगा कि आप की कोई इज्जत या कीमत नहीं है, लेकिन आप याद रखें कि आप परमेश्वर के बहुमूल्य मैमने के कीमती लहू के द्वारा खरीदे गए है। यह सब परमेश्वर ने इसलिए किया कि आपको यह अहसास दिलाये कि आपकी कीमत परमेश्वर की नज़र में क्या है।

मैं सोचता हूँ कि आगे दिया गया प्रभु के दास का वाक्य शायद इस बात को ठीक से पेश करता है –

मसीह के द्वारा क्रूस पर उठायी गयी क्रूर सजा में हम पापी और विद्रोही मानवीय स्थिति के चरम दोषों घृणा, हिंसा, अन्याय, अहंकार, मूर्खता, व्यसनों, आत्म-उग्रता, अपमान, भय, और भय के साथ हमारे जुनून के ऊपर परमेश्वर के न्याय को देखते हैं: । मृत्यु की एक सामान्य संस्कृति के ऊपर जो मानव के उत्कर्ष के विरुद्ध है, परमेश्वर ने अपने बेटे को यातना के रोमन साधन (क्रूस) पर ऐसी मृत्यु दी कि उस मृत्यु में परमेश्वर ने भी उसको भुला दिया।
-जैम्स आर हार्ट