जीवन की पवित्रता : मसीही दृष्टिकोण

मसीही दृष्टिकोण के हिसाब से जीवन अपने आप में पवित्र है, क्योंकि जीवन का उत्पतिकर्ता परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर अनंत है एवं इसी कारण से परमेश्वर ने जीवन को भी अनंत ही बनाया। इसी कारण पवित्र बाइबिल में स्पष्ट लिखा है कि परमेश्वर ने मानव को अपने “स्वरूप एवं समानता” में निर्मित किया (उत्पति 1:26). कहने का सीधा तात्पर्य यह है कि यह शरीर, साँसें तथा भावनात्मक व्यक्तित्व इत्यादि सब कुछ पवित्र है। सेक्स, भूख एवं लालसा इत्यादि सब कुछ पवित्र है। मसीहत में अपवित्रता का अर्थ यह है कि पापकर्म के कारण शरीर एवं आत्मा में कुछ दोष या विकृति का वास हो चुका है मगर उसका तात्पर्य यह कभी नहीं हो सकता कि हम हमारे शरीर या शारीरिक इच्छाओं से यह सोचकर घृणा करने लगें कि हमारा शरीर अशुद्ध है। नहीं। हरगिज नहीं। शरीर की पवित्रता एवं अनंतता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पापी एवं धर्मी सब जीवित किये जायेंगे एवं स्वर्ग या नरक में अनंत काल तक शरीर के साथ डाले जाएंगे। यौन इच्छा एवं वैवाहिक सम्बन्ध पवित्र है क्योंकि सृष्टि के प्रथम जोड़े को परमेश्वर ने आशीष दी कि “फूलो फलो एवं पृथ्वी में भर जाओ” (उत्पति 1:28)। भोजन इत्यादि कि इच्छा पवित्र है क्योंकि परमेश्वर ने स्वाद एवं आनंद की अनुभूति के साथ जीवन का निर्माण किया और आशीष दी कि मनुष्य भोज्य पदार्थों का आनंद ले क्योंकि उसी के आनंद के लिए पेड़ पौधों इत्यादि का निर्माण किया गया (उत्पति 2:16). कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर अपनी लालसाओं के साथ अपने आप में पवित्र है। शरीर के किसी भी अंग में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपवित्र माना जाए।

Published by

Hasti

A student and teacher of religions and philosophies. A follower of Lord Jesus Christ

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